Tuesday, April 30, 2019

मैं मोदी के सामने खड़ा होकर पुलवामा पर सवाल करूंगाः तेज बहादुर यादव

समाजवादी पार्टी ने बीएसएफ़ के पूर्व जवान तेज बहादुर यादव को वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ उम्मीदवार बनाया है.
निर्दलीय उम्मीदवारी करने वाले तेज बहादुर अब प्रधानमंत्री के सामने महागठबंधन के उम्मीदवार होंगे.
बीबीसी से बात करते हुए तेज बहादुर ने कहा कि उन्होंने सभी दलों को पत्र लिखा था जिसके बाद समाजवादी पार्टी की ओर से उन्हें फ़ोन आया.
उन्होंने कहा, "मैंने वाराणसी पहुंचने के बाद सभी दलों को चिट्ठी लिखी थी और किसानों, सैनिकों और बेरोज़गारों के हितों की बात करने वाली पार्टियों से अपने चुनाव अभियान में सहयोग करने के लिए कहा था. सबसे पहले आम आदमी पार्टी ने हमारा समर्थन कर दिया था. दो दिन पहले मुझे समाजवादी पार्टी की ओर से फ़ोन आया और लखनऊ आने के लिए कहा गया."
तेज बहादुर ने बताया, "मेरी मुलाक़ात अखिलेश यादव से हुई. उन्होंने मुझे पार्टी की ओर से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव देते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी मेरे सभी मुद्दों से सहमत है."
जब उनसे पूछा गया कि यदि समाजवादी पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस भी उन्हें लड़ने का प्रस्ताव देती तो क्या वो कांग्रेस की ओर से भी चुनाव लड़ लेते. उन्होंने कहा, "जो पार्टी मेरे मुद्दों को सही तरीके से समझे और आगे हमारे मुद्दों को लेकर चले तो हम उसी पार्टी से लड़ते. यदि कांग्रेस हमारे मुद्दों से सहमत होती तो हम उससे भी लड़ लेते. लेकिन कांग्रेस ने हमारे मुद्दे अपने मेनिफेस्टो में शामिल नहीं किए हैं."
क्या एक पार्टी की ओर से लड़ने से उनके अपने मुद्दे कमज़ोर पड़ जाएंगे और पार्टी की विचारधारा हावी हो जाएगी? इस सवाल पर तेज बहादुर कहते हैं, "हमारे मुद्दे पार्टी के भी मुद्दे हैं. पार्टी ने कहा है कि हमारी लड़ाई जवान, किसान, बेरोज़गार, मज़दूरों के लिए है. पार्टी ने जवानों की पेंशन का मुद्दा और शहीद के दर्जे का मुद्दा उठाया हुआ है. हमारे मुद्दे मिले हुए हैं और मैंने अपने मुद्दे भी जोड़े हैं."
समाजवादी पार्टी ने पहले शालिनी यादव को वाराणासी से उम्मीदवार बनाया था. अब उनकी जगह तेज बहादुर को उम्मीदवारी दी गई है.
क्या शालिनी यादव चुनाव अभियान में उनकी मदद करेंगी. इस सवाल पर वो कहते हैं, "उन्होंने कहा कि वो महिलाओं की ओर से मेरा समर्थन करेंगी और मेरा साथ देंगी. उनका भी पर्चा भरवाया गया है. ये (बीजेपी) बड़े शातिर लोग हैं, अड़चनें डालकर मेरा नामांकन भी रद्द करवा सकते हैं. मेरी उम्मीदवारी का फ़ैसला अध्यक्ष जी का है. कुछ सोच-समझकर ही उन्होंने मेरी उम्मीदवारी का मास्टर स्ट्रोक चला होगा."
तेज बहादुर का कहना है कि पार्टी की ओर से उम्मीदवारी मिलने के बाद उनका चुनाव अभियान मज़बूत हुआ है क्योंकि अब वो महागठबंधन की ओर से मज़बूत चुनाव चिह्न के साथ चुनाव लड़ेंगे.
कांग्रेस के प्रत्याशी अजय राय भी वाराणसी से मैदान में हैं. तेज बहादुर ने कांग्रेस को भी चिट्ठी लिखी है और सहयोग मांगा है.
वो कहते हैं, "अगर उनकी समझ में आया तो वो भी हमारे साथ आ जाएंगे. ऐसा होगा तो बहुत अच्छी बात होगी."
तेज बहादुर मूल रूप से हरयाणा के रहने वाले हैं और साल 2017 में उनका एक वीडियो वायरल हुआ था. तेज बहादुर उस समय बीएसएफ़ में कार्यरत थे. अपने वीडियो में उन्होंने जवानों को मिलने वाले खाने की गुणवत्ता को लेकर शिकायत की थी.
वाराणसी से आकर चुनाव लड़ने के सवाल पर वो कहते हैं, "काशी काल भैरव का स्थान है. अगर मोदी यहां से जीत सकते हैं तो मुझे भी पूर्ण विश्वास है कि वाराणसी की जनता मुझे भी आशीर्वाद देगी. मैं भी पहली बार आया हूं"
वो कहते हैं, "जो वादे किए थे वो भी मोदी ने ही किए थे. उन्हीं भावनाओं में बहकर सेना में रहते हुए मैंने रोटी का सवाल उठाया था जिसके बदले मुझे बर्खास्तगी मिली. बाद में मेरे बेटे की भी मौत हो गई. देश में एक भी वादा उन्होंने पूरा किया नहीं. अब मैं सीधे प्रधानमंत्री के सामने सवाल पूछने आया हूं. मैं उनसे पूछूंगा कि 2014 में जो वादे किए थे उनमें से एक भी पूरा किया है क्या."
तेज बहादुर कहते हैं, "वाराणसी आने का मेरा सबसे पहला मक़सद है देश की सुरक्षा. वाराणसी की समस्याएं तो मेरा मुद्दा रहेंगी ही लेकिन मैं देश के मुद्दों पर भी बात करूंगा. देश को जो बाक़ी मुद्दे हैं- सुरक्षा का मुद्दा है, रोज़गार का मुद्दा है. उनपर भी बात होगी."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने चुनाव अभियान में दावा करते रहे हैं कि उनके कार्यकाल में देश की सुरक्षा मज़बूत हुई है. इस पर सवाल उठाते हुए तेज बहादुर कहते हैं, "यदि ऐसा है तो फिर वो बताएं कि पुलवामा हमला कैसे हो गया. और उसकी जांच क्यों नहीं कराई गई?"

Tuesday, April 9, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

इस बात पर लोगों को अचरज हुआ जब 15वीं वित्त आयोग ने 2011 के जनगणना के आंकड़ों का आधार किया है, जबकि 14वीं वित्त आयोगम 1971 के आंकड़े लिए गए थे. इस वजह से कहीं ज्यादा शिक्षित दक्षिण भारतीय राज्यों को बेहतर परिवार नियोजन और कम आबादी के चलते कम अनुदान भी मिला.
बीजेपी इन सवालों के जवाब को पैसों के आवंटन से जोड़ती रही है. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह कहते रहे हैं कि जबसे एनडीए की सरकार बनी है तबसे दक्षिण भारतीय राज्यों को कहीं ज्यादा पैसा मिला है. हालांकि वे ऐसा कहते वक्त ये भूल जाते हैं कि दक्षिण भारतीय राज्य राष्ट्रीय राजस्व में कितना योगदान देते हैं. कर्नाटक और तमिलनाडु देश के आयकर जुटाने वाले देश के शीर्ष चार राज्यों में शामिल हैं.
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज के प्रोफेसर नरेंद्र पानी कहते हैं, "15वीं वित्त आयोग उत्तर ङाकच तो ज्यादा तरजीह दी गई क्योंकि वहां आबादी बहुत ज्यादा है. इसलिए भी दिल्ली की उपेक्षा के बाद भी दक्षिण भारतीय राज्यों के बेहतर करने की सोच को बढ़ावा मिला."
इसके अलावा दक्षिण भारतीय राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी कई बार अहम मुद्दों पर बातचीत के लिए प्रधानमंत्री से समय नहीं मिलने की शिकायत की. इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपाल और लेफ्टिनेंट गवर्नर भी केंद्र सरकार के इशारों पर काम कर रहे होते हैं.
इसके अलावा अलग अलग राज्यों के अपने मसले भी रहे हैं. तमिलनाडु में एनईईटी, जलीकट्टू और स्टारलाइट, केरल में सबरीमला मंदिर में प्रवेश और कथित तौर पर आरएसएस कार्यकर्ता की हत्याएं, गोवा, कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच मांडवी और कावेरी नदी के पानी का बंटवारे के मुद्दों से बीजेपी के एंटी साउथ सेंटीमेंट को ही बढ़ावा दिया है.
कर्नाटक के ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री कृष्णा बायरे गौड़ा कहते हैं, "प्रधानमंत्री द्वारा कमतर आंके जाने का भाव रहा है."
जाहिर है कि पांचों दक्षिण भारतीय राज्यों के ये असमान मुद्दों की भूमिका विभिन्न स्तरों पर रही हैं, जो एक दूसरे से जुड़े भी नजर आते हैं.
लेकिन सवाल वही है कि क्या राहुल गांधी की वायनाड से उम्मीदवारी कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के लिए मैजिक का काम कर पाएगी जो बीजेपी के अभियान को टक्कर दे पाएगी.
कांग्रेस ने इस तरह की क्षेत्रीयता और भाषाई रूढ़िवाद का सहारा कर्नाटक के विधानसभा चुनावों के दौरान लिया था. मेट्रो ट्रेन स्टेशनों में हिंदी भाषा का इस्तेमाल और कर्नाटक में कन्नड़ बोलने वालों को नौकरी में प्राथमिकता देने की मांग, एक तरह से स्मार्ट रणनीति का हिस्सा था.
लेकिन आख़िरकार, कर्नाटक में कांग्रेस 120 से एक तिहाई घटकर 80 सीट पर आ गई थी.
वायनाड से उम्मीदवारी के बाद भी राहुल गांधी मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए विपक्षी दलों को दक्षिण भारत विरोधी के तौर पर प्रचारित करना जारी रखेंगे.
वहीं नरेंद्र मोदी, को चेन्नई एयरपोर्ट से आईआईटी मद्रास तक की पांच किलोमीटर की दूरी हेलिकॉप्टर से तय करनी पड़ी. उन्होंने काले झंडो के विद्रोह से बचने के लिए ऐसा किया था लेकिन उन्हें हेलिकॉप्टर में में काले बैलून देखने पड़ गए.
बहरहाल, भारत के दोनों बड़े राजनीतिक दल इस बात को भूल रहे हैं कि दक्षिण भारत ही नहीं पूरे भारत के बहुत बड़े हिस्से में 'न्यूनतम आय' और 'संकल्पित भारत, सशक्त भारत' का कोई प्रभाव नहीं है.
(कृष्णा प्रसाद आउटलुक साप्ताहिक के पूर्व एडिटर इन चीफ़ हैं और भारतीय प्रेस काउंसिल के पूर्व सदस्य हैं)