अमरीका की शिकायत है कि पाकिस्तान आर्थिक और सैन्य मदद लेता रहा लेकिन उसने आतंकवाद के ख़िलाफ़ कुछ नहीं किया. सोमावर को जब दोनों नेता व्हाइट हाउस में मिले तो चेहर पर हँसी थी.
इमरान ख़ान ने कहा कि वो प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही अमरीका से संबंध को आगे बढ़ाने को लेकर प्रतिबद्ध हैं. दूसरी तरफ़ ट्रंप ने इमरान के सामने ही कहा, ''पाकिस्तान ने अतीत में अमरीका का सम्मान नहीं किया है. अभी पाकिस्तान को बहुत कुछ करना है. हम इमरान ख़ान को लेकर आशावादी हैं और उम्मीद है कि रिश्तों में मधुरता आएगी.''
ट्रंप ने अफ़ग़ानिस्तान को लेकर कहा, ''अगर युद्ध जीतना चाहता तो पृथ्वी से ही मिटा देता. हम ऐसा नहीं करना चाहते हैं.'' ट्रंप चाहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान की सकारात्मक भूमिका निभाए. अफ़ग़ानिस्तान पर इमरान ख़ान ने कहा कि यह अमरीका के लिए सबसे लंबा युद्ध रहा है और उन्हें लगता है कि इसका समाधान राजनीतिक ही हो सकता है.
नंवबर में ट्रंप ने ट्वीट कर कहा था, ''पाकिस्तान ने ओसामा बिन-लादेन को छुपा कर रखा था. आख़िरकार हमने पाकिस्तान में घुसकर मारा.'' इमरान ख़ान कहते रहे हैं कि पाकिस्तान ने आतंकवाद की सबसे बड़ी क़ीमत चुकाई है.
ट्रंप ने कहा कि वो अफ़ग़ानिस्तान युद्ध एक हफ़्ते में जीत सकते हैं लेकिन नहीं चाहते हैं कि एक करोड़ लोगों की जान जाए. ट्रंप ने इमरान ख़ान के सामने ही कहा, ''समस्या यह है कि पाकिस्तान ने हमारे लिए कुछ नहीं किया और यही उलट-पुलट करने वाला साबित हुआ. मुझे लगता है कि पाकिस्तान के साथ अभी सबसे अच्छा संबंध है और ऐसा कभी नहीं रहा.''
ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद बहाल की जा सकती है लेकिन यह उस पर निर्भर करता है कि पाकिस्तान कितना ठोस कर रहा है. लेकिन ट्रंप ने कहा कि अमरीका-पाकिस्तान संबंध बिना आर्थिक मदद मुहैया कराए ही अच्छा है.
26 मई 1999 को रात साढ़े नौ बजे भारत के थलसेनाध्यक्ष जनरल वेदप्रकाश मलिक के सेक्योर इंटरनल एक्सचेंज फ़ोन की घंटी बजी. दूसरे छोर पर भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के सचिव अरविंद दवे थे. उन्होंने जनरल मलिक को बताया कि उनके लोगों ने पाकिस्तान के दो चोटी के जनरलों के बीच एक बातचीत को रिकार्ड किया है.
उनमें से एक जनरल बीजिंग से बातचीत में शामिल था. फिर उन्होंने उस बातचीत के अंश पढ़ कर जनरल मलिक को सुनाए और कहा कि इसमें छिपी जानकारी हमारे लिए महत्वपूर्ण हो सकती है.
जनरल मलिक ने उस फोन-कॉल को याद करते हुए बीबीसी को बताया, 'दरअसल दवे ये फ़ोन डायरेक्टर जनरल मिलिट्री इंटेलिजेंस को करना चाहते थे, लेकिन उनके सचिव ने ये फ़ोन ग़ल्ती से मुझे मिला दिया. जब उन्हें पता चला कि डीजीएमआई की जगह मैं फ़ोन पर हूँ तो वो बहुत शर्मिंदा हुए. मैंने उनसे कहा कि वो इस फ़ोन बातचीत की ट्राँस- स्क्रिप्ट तुरंत मुझे भेजें.'
जनरल मलिक ने आगे कहा, 'पूरी ट्रांस- स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद मैंने अरविंद दवे को फ़ोन मिला कर कहा मेरा मानना है कि ये बातचीत जनरल मुशर्रफ़ जो कि इस समय चीन में हैं और एक बहुत सीनियर जनरल के बीच में है. मैंने दवे को सलाह दी कि आप इन टेलिफ़ोन नंबरों की रिकार्डिंग करना जारी रखें, जो कि उन्होंने की.'
जनरल मलिक कहते हैं, ''तीन दिन बाद रॉ ने इन दोनों के बीच एक और बातचीत रिकार्ड की. लेकिन इस बार उसे डायरेक्टर जनरल मिलिट्री इंटेलिंजेंस या मुझसे साझा करने के बजाए उन्होंने ये जानकारी सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को भेज दी. 2 जून को जब मैं प्रधानमंत्री वाजपेई और ब्रजेश मिश्रा के साथ नौसेना के एक समारोह में भाग लेने मुंबई गया तो लौटते समय प्रधानमंत्री ने मुझसे ताज़ा ताज़ा 'इंटरसेप्ट्स' के बारे में पूछा.''
''तब जा कर ब्रजेश मिश्रा को अहसास हुआ कि मैंने तो उन्हें देखा ही नहीं है. वापस लौटते ही उन्होंने इस ग़लती को सुधारा और मुझे इस बातचीत की ट्रांस - स्क्रिप्ट भी भेज दी. ''
ये घटना बताती है कि लड़ाई के समय भी हमारा ख़ुफ़ियातंत्र जानकारियों को सबके साथ न बाँट कर चोटी के चुनिंदा लोगों तक पहुंचा रहा था ताकि 'टर्फ़ वॉर' में उनका दबदबा रहे.
1 जून तक प्रधानमंत्री वाजपेई और सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति को ये टेप सुनवाए जा चुके थे.
4 जून को भारत ने इन टेपों को उनकी ट्राँस - स्क्रिप्ट के साथ प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को सुनवाने का फ़ैसला किया. अगर मुशर्ऱफ़ की बातचीत को रिकार्ड करना भारतीय इंटेलिजेंस के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी, तो उन टेपों को नवाज़ शरीफ़ तक पहुंचाना भी कम बड़ा काम नहीं था.
सवाल उठा कि इन संवेदनशील टेपों को ले कर कौन इस्लामाबाद जाएगा?
एक सूत्र ने नाम न लिए जाने की शर्त पर बताया कि इसके लिए मशहूर पत्रकार आर के मिश्रा को चुना गया, जो उस समय आस्ट्रेलिया गए हुए थे. उन्हें भारत बुला कर ये ज़िम्मेदारी दी गई.
इस डर से कि कहीं इस्लामाबाद हवाई अड्डे पर उनकी तलाशी न ले ली जाए, उन्हें 'डिप्लोमैट' का दर्जा दिया गया ताकि उन्हें 'डिप्लोमैटिक इम्म्यूनिटी' मिल सके.
उनके साथ भारतीय विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव विवेक काटजू भी गए.
आर के मिश्रा ने सुबह साढ़े आठ बजे नाश्ते के समय नवाज़ शरीफ़ से मुलाकात कर उन्हें वो टेप सुनवाया और उसकी ट्रांस - स्क्रिप्ट उनके हवाले की.
मिश्रा और काटजू उसी शाम ये काम पूरा कर दिल्ली वापस आ गए. इस यात्रा को इतना गुप्त रखा गया कि कम से कम उस समय इसकी कहीं चर्चा नहीं हुई.
सिर्फ़ कोलकाता से छपने वाले अख़बार 'टेलिग्राफ़' ने अपने 4 जुलाई 1999 के अंक में प्रणय शर्मा की एक रिपोर्ट छापी जिसका शीर्षक था, 'डेल्ही हिट्स शरीफ़ विद आर्मी टेप टॉक.'
इस रिपोर्ट में बताया गया कि भारत ने इस टेप को नवाज़ शरीफ़ को सुनाने के लिए विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव विवेक काटजू को इस्लामाबाद भेजा था.
रॉ के पूर्व अतिरिक्त सचिव बी रमण ने 22 जून 2007 को आउटलुक पत्रिका में लिखे एक लेख 'रिलीज़ ऑफ़ कारगिल टेप मास्टरपीस ऑर ब्लंडर ?' में साफ़ कहा कि नवाज़ शरीफ़ को टेप सुनाने वालों को साफ़ निर्देश थे कि वो उस टेप को उन्हें सुना कर वापस ले आएं. उन्हें उनके हवाले न करें.
मिश्रा ने बाद में इस बात का खंडन किया कि उन्होंने ये काम किया था. विवेक काटजू ने भी कभी सार्वजनिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की.
इस सबके पीछे भारतीय ख़ेमे जिसमें रॉ के सचिव अरविंद दवे, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा और जसवंत सिंह शामिल थे, की सोच ये थी कि इन सबूतों से दो चार होने और इस आशंका के बाद कि भारत के पास इस तरह के और टेप हो सकते हैं, कारगिल पर पाकिस्तानी नेतृत्व और दबाव में आएगा.
इमरान ख़ान ने कहा कि वो प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही अमरीका से संबंध को आगे बढ़ाने को लेकर प्रतिबद्ध हैं. दूसरी तरफ़ ट्रंप ने इमरान के सामने ही कहा, ''पाकिस्तान ने अतीत में अमरीका का सम्मान नहीं किया है. अभी पाकिस्तान को बहुत कुछ करना है. हम इमरान ख़ान को लेकर आशावादी हैं और उम्मीद है कि रिश्तों में मधुरता आएगी.''
ट्रंप ने अफ़ग़ानिस्तान को लेकर कहा, ''अगर युद्ध जीतना चाहता तो पृथ्वी से ही मिटा देता. हम ऐसा नहीं करना चाहते हैं.'' ट्रंप चाहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान की सकारात्मक भूमिका निभाए. अफ़ग़ानिस्तान पर इमरान ख़ान ने कहा कि यह अमरीका के लिए सबसे लंबा युद्ध रहा है और उन्हें लगता है कि इसका समाधान राजनीतिक ही हो सकता है.
नंवबर में ट्रंप ने ट्वीट कर कहा था, ''पाकिस्तान ने ओसामा बिन-लादेन को छुपा कर रखा था. आख़िरकार हमने पाकिस्तान में घुसकर मारा.'' इमरान ख़ान कहते रहे हैं कि पाकिस्तान ने आतंकवाद की सबसे बड़ी क़ीमत चुकाई है.
ट्रंप ने कहा कि वो अफ़ग़ानिस्तान युद्ध एक हफ़्ते में जीत सकते हैं लेकिन नहीं चाहते हैं कि एक करोड़ लोगों की जान जाए. ट्रंप ने इमरान ख़ान के सामने ही कहा, ''समस्या यह है कि पाकिस्तान ने हमारे लिए कुछ नहीं किया और यही उलट-पुलट करने वाला साबित हुआ. मुझे लगता है कि पाकिस्तान के साथ अभी सबसे अच्छा संबंध है और ऐसा कभी नहीं रहा.''
ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद बहाल की जा सकती है लेकिन यह उस पर निर्भर करता है कि पाकिस्तान कितना ठोस कर रहा है. लेकिन ट्रंप ने कहा कि अमरीका-पाकिस्तान संबंध बिना आर्थिक मदद मुहैया कराए ही अच्छा है.
26 मई 1999 को रात साढ़े नौ बजे भारत के थलसेनाध्यक्ष जनरल वेदप्रकाश मलिक के सेक्योर इंटरनल एक्सचेंज फ़ोन की घंटी बजी. दूसरे छोर पर भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के सचिव अरविंद दवे थे. उन्होंने जनरल मलिक को बताया कि उनके लोगों ने पाकिस्तान के दो चोटी के जनरलों के बीच एक बातचीत को रिकार्ड किया है.
उनमें से एक जनरल बीजिंग से बातचीत में शामिल था. फिर उन्होंने उस बातचीत के अंश पढ़ कर जनरल मलिक को सुनाए और कहा कि इसमें छिपी जानकारी हमारे लिए महत्वपूर्ण हो सकती है.
जनरल मलिक ने उस फोन-कॉल को याद करते हुए बीबीसी को बताया, 'दरअसल दवे ये फ़ोन डायरेक्टर जनरल मिलिट्री इंटेलिजेंस को करना चाहते थे, लेकिन उनके सचिव ने ये फ़ोन ग़ल्ती से मुझे मिला दिया. जब उन्हें पता चला कि डीजीएमआई की जगह मैं फ़ोन पर हूँ तो वो बहुत शर्मिंदा हुए. मैंने उनसे कहा कि वो इस फ़ोन बातचीत की ट्राँस- स्क्रिप्ट तुरंत मुझे भेजें.'
जनरल मलिक ने आगे कहा, 'पूरी ट्रांस- स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद मैंने अरविंद दवे को फ़ोन मिला कर कहा मेरा मानना है कि ये बातचीत जनरल मुशर्रफ़ जो कि इस समय चीन में हैं और एक बहुत सीनियर जनरल के बीच में है. मैंने दवे को सलाह दी कि आप इन टेलिफ़ोन नंबरों की रिकार्डिंग करना जारी रखें, जो कि उन्होंने की.'
जनरल मलिक कहते हैं, ''तीन दिन बाद रॉ ने इन दोनों के बीच एक और बातचीत रिकार्ड की. लेकिन इस बार उसे डायरेक्टर जनरल मिलिट्री इंटेलिंजेंस या मुझसे साझा करने के बजाए उन्होंने ये जानकारी सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को भेज दी. 2 जून को जब मैं प्रधानमंत्री वाजपेई और ब्रजेश मिश्रा के साथ नौसेना के एक समारोह में भाग लेने मुंबई गया तो लौटते समय प्रधानमंत्री ने मुझसे ताज़ा ताज़ा 'इंटरसेप्ट्स' के बारे में पूछा.''
''तब जा कर ब्रजेश मिश्रा को अहसास हुआ कि मैंने तो उन्हें देखा ही नहीं है. वापस लौटते ही उन्होंने इस ग़लती को सुधारा और मुझे इस बातचीत की ट्रांस - स्क्रिप्ट भी भेज दी. ''
ये घटना बताती है कि लड़ाई के समय भी हमारा ख़ुफ़ियातंत्र जानकारियों को सबके साथ न बाँट कर चोटी के चुनिंदा लोगों तक पहुंचा रहा था ताकि 'टर्फ़ वॉर' में उनका दबदबा रहे.
1 जून तक प्रधानमंत्री वाजपेई और सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति को ये टेप सुनवाए जा चुके थे.
4 जून को भारत ने इन टेपों को उनकी ट्राँस - स्क्रिप्ट के साथ प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को सुनवाने का फ़ैसला किया. अगर मुशर्ऱफ़ की बातचीत को रिकार्ड करना भारतीय इंटेलिजेंस के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी, तो उन टेपों को नवाज़ शरीफ़ तक पहुंचाना भी कम बड़ा काम नहीं था.
सवाल उठा कि इन संवेदनशील टेपों को ले कर कौन इस्लामाबाद जाएगा?
एक सूत्र ने नाम न लिए जाने की शर्त पर बताया कि इसके लिए मशहूर पत्रकार आर के मिश्रा को चुना गया, जो उस समय आस्ट्रेलिया गए हुए थे. उन्हें भारत बुला कर ये ज़िम्मेदारी दी गई.
इस डर से कि कहीं इस्लामाबाद हवाई अड्डे पर उनकी तलाशी न ले ली जाए, उन्हें 'डिप्लोमैट' का दर्जा दिया गया ताकि उन्हें 'डिप्लोमैटिक इम्म्यूनिटी' मिल सके.
उनके साथ भारतीय विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव विवेक काटजू भी गए.
आर के मिश्रा ने सुबह साढ़े आठ बजे नाश्ते के समय नवाज़ शरीफ़ से मुलाकात कर उन्हें वो टेप सुनवाया और उसकी ट्रांस - स्क्रिप्ट उनके हवाले की.
मिश्रा और काटजू उसी शाम ये काम पूरा कर दिल्ली वापस आ गए. इस यात्रा को इतना गुप्त रखा गया कि कम से कम उस समय इसकी कहीं चर्चा नहीं हुई.
सिर्फ़ कोलकाता से छपने वाले अख़बार 'टेलिग्राफ़' ने अपने 4 जुलाई 1999 के अंक में प्रणय शर्मा की एक रिपोर्ट छापी जिसका शीर्षक था, 'डेल्ही हिट्स शरीफ़ विद आर्मी टेप टॉक.'
इस रिपोर्ट में बताया गया कि भारत ने इस टेप को नवाज़ शरीफ़ को सुनाने के लिए विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव विवेक काटजू को इस्लामाबाद भेजा था.
रॉ के पूर्व अतिरिक्त सचिव बी रमण ने 22 जून 2007 को आउटलुक पत्रिका में लिखे एक लेख 'रिलीज़ ऑफ़ कारगिल टेप मास्टरपीस ऑर ब्लंडर ?' में साफ़ कहा कि नवाज़ शरीफ़ को टेप सुनाने वालों को साफ़ निर्देश थे कि वो उस टेप को उन्हें सुना कर वापस ले आएं. उन्हें उनके हवाले न करें.
मिश्रा ने बाद में इस बात का खंडन किया कि उन्होंने ये काम किया था. विवेक काटजू ने भी कभी सार्वजनिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की.
इस सबके पीछे भारतीय ख़ेमे जिसमें रॉ के सचिव अरविंद दवे, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा और जसवंत सिंह शामिल थे, की सोच ये थी कि इन सबूतों से दो चार होने और इस आशंका के बाद कि भारत के पास इस तरह के और टेप हो सकते हैं, कारगिल पर पाकिस्तानी नेतृत्व और दबाव में आएगा.